Source: Amar Ujala (21-June-2019)

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जो बच्चे कल तक पढ़ाई के महत्व से अंजान थे और अपना ज़्यादातर समय गलियों और चौराहों में खेलने में बिता दिया करते थे, वे अब न सिर्फ पढ़ाई के महत्व को समझ रहे हैं, बल्कि अपनी आंखों में कुछ बनने का सपना संजोयें नज़र आते हैं।यह सब संभव हुआ है रायपुर, छत्तीसगढ़ की अंकिता जैन के प्रयासों से, जिन्होंने पत्रकारिता की पढ़ाई की है और वर्तमान में एक सामाजिक संस्था के लिए काम करती हैं।दो साल पहले अंकिता ने इन बच्चों में शिक्षा की अलख जगाकर, इन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरीत किया और ‘तालीम एक प्रयास’ की शुरुआत की और आज इस पहल के माध्यम से वे लगभग 60 बच्चों को शिक्षा प्रदान कर रही है ।‘तालीम एक प्रयास’ पहल के माध्यम से अंकिता रायपुर के आदर्श नगर बस्ती के बच्चों को पिछले दो साल से पढ़ा रही है। इनमें से ज़्यादातर बच्चे ऐसे हैं, जिनके माता-पिता दिहाड़ी-मजदूरी करके अपना घर चलाते हैं। दो साल पहले इस बस्ती में शिक्षा को लेकर न कोई विशेष जागरूकता थी और न ही बच्चों को पढ़ने में कोई दिलचस्पी। तालीम के माध्यम से इन बच्चों में पढ़ाई के प्रति जागरूकता लाने का काम अंकिता लगातार दो सालों से कर रही है। समय-समय पर अधिक से अधिक बच्चों को इस पहल से जोड़ने के लिए अंकिता इन्हें नई कॉपी और स्टेशनरी आदि भी उपलब्ध कराती है।शहर के कई युवा भी अब समय-समय पर इस नेक काम में अंकिता का साथ देते हैं, इनमें रोशनी और आकांक्षा विशेष सहयोगी रही हैं, जो जब भी समय मिलता है अंकिता के इस कार्य मे उनकी मदद करती है।पढ़ाई के प्रति अंकिता की बचपन से ही रुचि रही है और ज़रूरतमंद की मदद करना उन्हें हमेशा से ही अच्छा लगता था। यही वजह है कि वे अपने काम से लौटते वक्त जब बस्ती के बच्चों की स्थिति देखती, तो उनके मन में इन बच्चों के लिए कुछ करने की इच्छा जागा करती।बच्चों की वह ख़ामोशी उन्हें बेहद असहज लगी।बस फिर क्या था, गुरु पूर्णिमा के दिन अंकिता ने इस नेक काम की शुरुआत कर दी। बच्चों और उनके माता-पिता को समझाना थोड़ा मुश्किल ज़रूर था पर उनकी मजबूत इच्छाशक्ति के आगे सारी मुश्किलों ने घुटने टेक दिए।

अंकिता कहती है, “बड़ा मुश्किल काम था बस्ती वालों को विश्वास दिलाना कि मैं निस्वार्थ भाव से बच्चों को पढ़ाने आई हूँ।इसके साथ साथ-बच्चों को जोड़े रखना भी आसान तो नहीं था पर जो मैंने उन्हें कुछ उनकी पसंद की चीज़ें, गिफ्ट और फनी गेम खिलाकर, यह भी कर लिया।”कई बार कुछ असामाजिक तत्त्व अंकिता की ऐसे भी कहकर हँसी उड़ाते थे कि ‘ये देखो मैडम जी पढ़ाने आई है’, लेकिन अंकिता ने हमेशा इस बात को याद रखा कि नेक राह में चलने वालों को बहुत परेशानियाँ आती है पर हिम्मत और साहस से काम लेने में ही भलाई होती है।अंकिता हफ्ते में 2 बार इन बच्चों को पढ़ाने जाती है। शुरुआत में बच्चों को पढ़ने के लिए बैठाने में उन्हें काफी मुश्किलें आई, लेकिन उनका दिल जीतने के लिए उन्होंने खेल-खेल में बच्चों को अपने से जोड़ा। जब बच्चों के साथ अच्छे से तालमेल बनने लगा तो इन्हें पढ़ाना शुरू किया। वे इंग्लिश, मैथ्स और हिंदी विषय पर ज़्यादा से ज़्यादा फोकस करती है, क्यूंकि अधिकाशं बच्चों को इन्हीं विषयों में ज्यादा मुश्किलें आती है। इतना ही नहीं पढाई के साथ-साथ सामान्य ज्ञान की भी एक विशेष क्लास लगती है, जिसमें देश और दुनिया की तमाम जानाकरी बच्चों को सरल शब्दों में दी जाती है।इन बच्चों के माता पिता की आँखों में सुकून है कि अब इनके बच्चे अपना समय व्यर्थ नहीं करते और वे भी अब कुछ बनने का सपना देखते हैं। अंकिता का सपना है कि वो ऐसे बच्चों के लिए एक स्कूल खोले, जहां सारी सुविधाएँ हो और बच्चों का सर्वांगीण विकास हो सके।

इन कक्षाओं की शुरुआत करने का मकसद बच्चों को शिक्षा के साथ जोड़ना और उनकी बौद्धिक क्षमता का विकास करना था। इसके बाद जब पढ़ाई के प्रति बच्चों का भी सकारात्मक रुझान देखने को मिला तो अंकिता का हौंसला और बढ़ गया। गरीब बच्चों को पढ़ाने का विचार तो शायद हममें से बहुत लोगों के ज़हन में आता है, लेकिन उस विचार को ज़मीन पर अंकिता जैन जैसे लोग ही ला रहे हैं। आज समाज में बहुत सी ऐसी समस्याएं हैं, जिनको देख कर असहजपन महसूस होता है, क्योंकि इस समाज की परेशानियों और उनका निदान करने का जिम्मा सरकार पर होता है।दूसरी तरफ कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो समाज में रहकर इन सामाजिक समस्याओं के समाधान के लिए आगे भी बढ़ते हैं और अपने जीवन को समाज के कार्यो में लगाते हैं। लेकिन जब कोई अंकिता जैन जैसी युवा सोच समाज की परेशानियों से जुड़कर उनके समाधान के लिए कदम बढ़ाती है, तो वह काबिल-ए-तारीफ़ होता है।

(Text Source:The Better India)

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