Source: Amar Ujala (12-June-2019)

Every year, going to the mountains is free treatment of thousands of people, this doctor

पिछले साल हिंदुस्तान टाइम्स में आई एक रिपोर्ट के मुताबिक, उत्तराखंड में अभी भी स्पेशलिस्ट डॉक्टरों के 60 फ़ीसदी पद खाली पड़े हैं और लगभग 20 फ़ीसद पदों पर नर्सों की नियुक्ति होनी बाकी है। साथ ही, राज्य के किसी भी जिले में कोई कार्डियक सेंटर नहीं है। यहाँ के निवासी, ख़ासकर पहाड़ी-ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोग न सिर्फ़ मेडिकल सुविधाओं, बल्कि अन्य मूलभूत सुविधाओं जैसे पक्की सड़क और पब्लिक ट्रांसपोर्ट आदि के अभाव में ज़िंदगी गुज़ार रहे हैं। देखा जाए तो सालों से उत्तराखंड विकास की राह देख रहा है, लेकिन इस दिशा में अभी तक कोई ख़ास क़दम नहीं उठाया गया है।आज एक ओर जहाँ बुद्धिजीवी और ख़ुद को सामाजिक कार्यकर्ता कहने वाले लोग बैठकर सिर्फ़ प्रशासन की कमियों पर बहस करते हैं, तो वहीं कुछ ऐसे लोग भी हैं जो आगे बढ़कर बदलाव के लिए ठोस क़दम उठाने में यक़ीन रखते हैं। कुमाऊँ और गढ़वाल क्षेत्र के ग्रामीण लोगों के लिए ऐसी ही पहल की है डॉ. असित खन्ना और उनके कुछ डॉक्टर साथियों ने, जो हर साल वहाँ जाकर मुफ़्त मेडिकल कैंप लगाते हैं। बता दें कि डॉ. असित खन्ना सिर्फ़ स्वास्थ्य ही नहीं, बल्कि शिक्षा और पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में भी काम कर रहे हैं।गाज़ियाबाद निवासी डॉ. असित खन्ना कौशाम्बी में स्थित यशोदा अस्पताल में कार्डियोलॉजिस्ट के पद पर कार्यरत हैं। लेकिन फिर भी साल में दो बार वे उत्तराखंड के पिछड़े इलाकों में मेडिकल कैंप लगाते हैं।पहाड़ और वहाँ के लोगों के प्रति अपने लगाव के बारे में वह कहते हैं, “मेरी परवरिश भले ही दिल्ली में हुई, पर जड़ें पहाड़ों से ही जुड़ी हैं। मैं नैनीताल में पैदा हुआ। वहाँ मेरी ननिहाल है। बचपन में गर्मियों की छुट्टियाँ वहीं बीतती थीं, इसलिए वहाँ के लोगों की परेशानियों के बारे में मुझे पहले से ही पता है।”लेकिन फिर भी वे पहाड़ के लोगों के लिए इस तरह का कुछ करेंगे, यह उन्होंने कभी नहीं सोचा था। उनके इस कदम के पीछे की प्रेरणा उनके पिता के साथ हुई एक दुर्घटना से जुड़ी है। साल 2012 में डॉ. असित और उनका परिवार नैनीताल घूमने गया हुआ था। वहाँ वे सभी पैराग्लाइडिंग कर रहे थे कि उनके पिता अचानक गिर गए और उनके कूल्हे में चोट लग गई। डॉ. असित ने तुरंत उन्हें संभाला और फिर आसपास अस्पताल ढूँढने लगे, ताकि उन्हें सही उपचार मिल सके।

डॉ. असित बताते हैं, “मुझे बहुत हैरानी हुई जब घंटों इधर-उधर घूमने के बाद भी हमें कोई अस्पताल नहीं मिला और जो मिला भी, वह बहुत ही साधारण स्तर का था। उस वक़्त मुझे लगा कि अगर यहाँ शहरों में ये हाल है तो गाँवों में लोग कैसे रहते होंगे।” बस यहीं से पहाड़ के लोगों के लिए कुछ करने का उन्होंने मन बना लिया।कुछ समय तक यहाँ के इलाकों के बारे में रिसर्च करने के बाद साल 2014 में उन्होंने अपने 4 डॉक्टर साथियों के साथ भीमताल के पास एक ग्रामीण क्षेत्र नौकुचियाताल में पहला मेडिकल कैंप लगाया। उनके पहले ही कैंप में लगभग एक हज़ार लोग आए। तीन दिन के इस मेडिकल कैंप में उन्होंने एक तरफ जहाँ लोगों का चेकअप किया, वहीं उन्हें ज़रूरी दवाइयाँ बिना किसी शुल्क के मुहैया करवाई। साथ ही, गंभीर बीमारी के लक्षण वाले मरीज़ों को शहर के सरकारी अस्पतालों में जाकर जाँच करवाने की सलाह दी।यहाँ के लोगों से बात करने पर उन्हें और भी समस्याओं के बारे में पता चला, जैसे स्कूलों में सुविधाओं की कमी, बच्चों के पास किताबों, जूते-चप्पल आदि का अभाव आदि। धीरे-धीरे डॉ. असित ने इन मसलों पर भी काम करना शुरू किया।साल 2017 में उन्होंने ‘होप फाउंडेशन’ का रजिस्ट्रेशन करवाया और इसके ज़रिए कई अभियान शुरू किए। वे बताते हैं कि इस काम में उन्हें परिवार वालों के साथ-साथ दोस्तों और रिश्तेदारों का भी साथ मिला। आर्थिक रूप से मदद करने से लेकर बहुत से लोग हर साल अपने काम से छुट्टी लेकर उनके साथ यहाँ कैंप में काम करने आते हैं।डॉ. असित कहते हैं, ” ज़्यादा से ज़्यादा लोग हमसे जुड़ें, इसके लिए मैंने ‘वर्क कम प्लेज़र’ का कॉन्सेप्ट अपनाया है। इसमें हम लोग दिन में लोगों का मेडिकल चेकअप करते हैं, स्कूलों में जाकर ज़रूरतमंद बच्चों को किताब, कॉपी, बैग, जूते-चप्पल आदि बांटते हैं। रात में सभी लोगों के मनोरंजन के लिए इंतजाम किए जाते हैं। टेंट लगाकर बॉनफायर के साथ में गाने-बजाने का कार्यक्रम होता है।“जो सफ़र सिर्फ़ 4-5 डॉक्टरों के साथ शुरू हुआ था, आज वह 35 से ज़्यादा सदस्यों तक पहुँच चुका है। लगभग 35 लोगों की टीम हर साल जुलाई और दिसंबर के महीने में उत्तराखंड में जाकर मेडिकल कैंप लगाती है। इन 35 लोगों में 5-6 डॉक्टर, कुछ नर्सेस, फार्मा क्षेत्र से जुड़े लोग और स्वयंसेवक होते हैं। टीम की कुछ महिला डॉक्टर अलग-अलग स्कूलों में जाकर छात्र-छात्राओं को माहवारी से जुड़े विषयों पर भी जागरूक करती हैं। सरकारी स्कूलों में वे कुछ स्थानीय एनजीओ और संस्थाओं की मदद से कॉपी, किताब, स्कूल बैग, जूते आदि का भी वितरण करते हैं। कुछ गरीब इलाकों में इन लोगों ने कंबल आदि बांटने के भी अभियान चलाए हैं।

देश और विदेशों से भी लोग गर्मियों के मौसम में इन ठंडे पहाड़ी इलाकों में छुट्टियाँ बिताने आते हैं। लेकिल सालों से टूरिज्म प्लेस रहे ये पहाड़ तेजी से अपना प्राकृतिक आकर्षण खोते जा रहे हैं। इसके पीछे वजह है बढ़ता प्रदूषण, हर जगह फैले प्लास्टिक के ढेर और साल-दर-साल सूखती झीलें व नदियाँ। यह पहाड़ों में बढ़ रहे औद्योगिकीकरण और लगातार हो रहे निर्माणों का नतीजा है।जब डॉ. असित ने देखा कि कैसे यहाँ पर टूरिज्म स्पॉट्स को बढ़ाने के लिए पहाड़ों और जंगलों को निशाना बनाया जा रहा है, तो उन्होंने इस दिशा में भी कुछ करने के बारे में सोचा। डॉ. असित कहते हैं, “जुलाई के महीने में हम जो कैंप करते हैं, उसका उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण है। यह मानसून का मौसम होता है और इसलिए इस मौसम में सबसे ज़्यादा पेड़ लगाने चाहिए।”इसके लिए उनकी एक टीम जगह-जगह घूमकर पौधारोपण करती है और लोगों को इनके संरक्षण के लिए जागरूक करती है। ये लोग समूह बनाकर अलग-अलग इलाकों में पौधारोपण करते हैं। ये जिस स्थानीय एनजीओ के साथ मिल कर यह अभियान चलाते हैं, उसकी ज़िम्मेदारी होती है कि पौधारोपण के बाद उन पौधों का ध्यान रखे। स्कूलों के बच्चे भी उनके इस अभियान का महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं।डॉ. असित ने कहा, “इस बार जुलाई में हमने लगभग 15,000 पौधारोपण करने का निश्चय किया है। यह अभियान हम ‘ग्रीन जीन’ नाम की संस्था के साथ मिलकर चलाएंगे। ग्रीन जीन ऐसी संस्था है जो न सिर्फ़ पौधारोपण करती है, बल्कि हर एक पौधे को एक यूनीक ‘क्यू आर/QR’ कोड भी देती है। हमने सोचा है कि कुछ पेड़ों को ‘QR’ कोड देने के बाद इन कोड्स को स्कूल के बच्चों के बीच बांटा जाएगा और उन्हें अपने-अपने कोड वाले पेड़ की देखभाल का ज़िम्मा दिया जाएगा।”पहाड़ों में ऐसे बहुत से इलाके हैं, जहाँ आप खुद जाकर पौधारोपण नहीं कर सकते। लेकिन ऐसी जगहों की मिट्टी पेड़-पौधों के विकास के लिए बहुत उपयुक्त है। यहाँ प्राकृतिक रूप से पौधे बड़े हो जाते हैं। ख़ासकर, यदि मानसून में पौधे लगाये जाएँ, तो बेहतर नतीजा मिलता है।आने वाले समय में भी पहाड़ी इलाकों के ये जंगल सघन बने रहें, इसके लिए डॉ. असित और उनके साथी, ‘सीड बॉम्बिंग’ तरकीब से काम कर रहे हैं। ये लोग गोबर और मिट्टी के मिश्रण में बीज डालते हैं और फिर इस मिश्रण से छोटी-छोटी बॉल तैयार करते हैं।इन छोटी-छोटी बॉल्स को मानसून के मौसम में या तो आप खुद ज़मीन में लगा दें या फिर जिन जगहों पर नहीं जाया जा सकता, वहाँ आप अगर फेंक भी दें, तो पूरी सम्भावना होती है कि ये बीज अंकुरित होकर पेड़ों के रूप में विकसित हों जाएंगे। इस साल डॉ. असित ने इस प्रक्रिया में ‘पैराग्लाइडर्स’ को भी शामिल करने का निर्णय लिया है, ताकि वे पैराग्लाइडिंग करते समय दुर्गम से दुर्गम स्थानों पर भी इन सीड बॉल्स को गिरा दें। इससे प्राकृतिक रूप से होने वाले पौधारोपण का प्रतिशत बढ़ सकेगा।

डॉ. असित कहते हैं कि जैसे भी संभव हो सकता है, हम पहाड़ों की स्थिति बदलने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन ये प्रयास सही मायने में उस दिन सफल होंगे, जब यहाँ के लोग खुद यह ज़िम्मेदारी उठाएंगे। यहाँ के गाँवों-कस्बों में हालात सिर्फ़ प्रशासन की अनदेखी के कारण नहीं, बल्कि लोगों की गैर-ज़िम्मेदारी के कारण भी ख़राब हुए हैं। यहाँ बहुत कम ऐसे लोग हैं, जो अच्छी पढ़ाई-लिखाई करने के बाद अपने गाँव में वापस आकर कुछ रचनात्मक काम करना चाहते हैं।इन्हीं वजहों से यहाँ के गरीब बच्चों को आगे बढ़ने के ज़्यादा अवसर नहीं मिलते हैं। बाहर जाकर पढ़ने का खर्च वे वहन नहीं कर सकते और पहाड़ों में इतने साधन और मौके नहीं हैं कि वे एक बेहतर भविष्य बना पाएं। इसलिए आप देखेंगे कि यहाँ के बच्चे स्कूली पढ़ाई के बाद टूरिस्ट गाइड या फिर छोटे-मोटे फोटोग्राफर बनकर ही रह जाते हैं।“हम लोगों की इसी सोच को बदलने के लिए काम कर रहे हैं। हमारा उद्देश्य यहाँ के युवाओं को नशे जैसी बुराइयों से दूर कर उन्हें एक बेहतर भविष्य देना है। मुझे ख़ुशी होती है, जब स्कूलों में बच्चे कहते हैं कि वे मेरी तरह डॉक्टर बनना चाहते हैं और डॉक्टर बन कर वे अपने गाँवों में ही क्लिनिक खोलेंगे। मेरी यही कोशिश है कि किसी भी तरह इन बच्चों के सपनों को पूरा करने में सहयोग कर सकूँ।”इन टूरिस्ट प्लेस के विकास की ज़िम्मेदारी यहाँ के स्थानीय प्रशासन और लोगों के साथ-साथ उन टूरिस्ट्स की भी है, जो हर साल यहाँ बढ़िया वक़्त बिताते हैं और अच्छी यादें संजो कर ले जाते हैं। इस बार आप सिर्फ़ यहाँ की याद लेकर ही मत जाइएगा, बल्कि यहाँ के लोगों की मदद करके अपनी भी कोई याद छोड़िएगा।

(Text Source:TheBetterIndia)

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