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पहले लोग कहते थे पौधा चोर, पर अब हूं ट्री मैन

Vishnu Lamba-The Treeman Of India

विष्णु लांबा का जन्म राजस्थान भारत के टोंक जिले के मेहन्दवास थाना क्षेत्र से तीन किलो मीटर दूरी पर बसे गाँव लाम्बा में तीन जून उनीस सौ सत्यासी को हुआ ! दुनियाँ के लिए इस अपरिचित से गाँव ने ट्रीमेंन के प्रयासों से आज दुनिया में अपनी अलग पहचान ‘पर्यावरणीय दृष्टि से राज्य के प्रथम आदर्श ग्राम’ के रूप में बनाई है ! विष्णु लाम्बा को बचपन से ही पेड़-पौधे और पशु-पक्षियों से गहरा लगाव था ! परिवार के संस्कारों नें उन्हें प्रकृति और संस्कृति के बहुत करीब रखा. संभवतया पांच-सात साल की उम्र रही होगी ! गाँव के चौराहे पर सर पर मटका लिए हेंडपंप पर पानी भरनें जाती माँ के साथ-साथ चल पड़े और पास में गोबर की रेवड़ी में गुठली से आम के पौधे की पत्तियाँ निकली दिखाई दी और देखते ही चिल्ला कर माँ से बोले ‘’माँ आम’’…. और माँ से जिद्द करनें लगे की इसे घर लेकर चलना है. माँ नें अपनी झोली में डाला और घर ले आई…. बस यही दिन था और आज का दिन है पर्यावरण और विष्णु लाम्बा एक दूसरे के पूरक हो गए… वही दूसरी और घर में सुबह-शाम गाय का दूध निकालती माँ, रात को माँ से रामायण सुनकर सोना, पिता जी का मंदिर में शखं नगाड़े बजाकर मंदिर में चारभुजा नाथ की सेवा करना, ऐसी कहीं बातें उन्हें संस्कृति के करीब ले आई. आम का पौधा घर में आनें के बाद नन्हे विष्णु का लालच बढा और अधिक पौधे पानें की लालसा नें उन्हें पौधे चौरी करना सिखा दिया…. कोई गाँव में दस पेड़ लगाता तो विष्णु को दो पौधे एवज में देकर जाता की खेत पर लगा रहा हूँ चुराना मत. पारिवारिक संस्कारों नें सन्यासियों के करीब लानें का काम किया…. और फिर संन्यास की और चल पड़े… तीन तिलक लगाना – चोटी रखना… घंटो साधना करना आदत सी बन गई… उसी दौराना टोंक में बनास नदी के किनारे संत कृष्णदास फलहारी बाबा के सानिध्य में आकर साधू दीक्षा लेनें की जिद्द करनें लगे लेकिन आश्रम के साधू ने यह कहते हुए साधू दीक्षा देनें से इनकार कर दिया की ‘तुम्हे बिन भगवा धारण किये ही बहुत बड़ा काम करना है’ !
टोंक के दूधिया बालाजी आश्रम में रहकर भी महाराज के साथ पेड़ लगाए जो आज विशाल दरखत बन गए… बचपन में विष्णु के खिलोनें कबूतर, तोते, कुत्ते के खूब सारे पिल्लै या पौधे होते थे. एक बार माँ नें मांगलियावास अजमेर से तीन पत्ते कल्प वृक्ष के लाकर दिए और कहा एक भगवान् के लिए मंदिर देकर आ. दूसरा अनाज के कोठे में रख दे जिससे कभी घर में अनाज ख़त्म नहीं होगा. और तीसरा तू अपनें पास रख ले जिससे तू सदा खुश रहकर दूसरों की भलाई के काम करेगा.. और बस यहीं से शुरू हो गई श्री कल्पतरु संस्थान की कहानी. आज विष्णु लाम्बा श्री कल्पतरु संस्थान के अध्यक्ष ज़रूर है लेकिन उनका काम करने का ढंग कुछ ऐसा है की हर कोई इनका कायल है ! वे ख़ुद को अतिसाधारण सा व्यक्ति मानकर कार्य करते है और अपने निराले अंदाज़ के चलते ऐसे ऐसे कार्यों को बखूबी अंजाम दे देते है जिन्हें कर पाना किसी चमत्कार से कम नहीं ! कुछ कार्य तो ऐसे किये जो इतिहास में कभी नहीं हुए !
संघर्ष के रास्तों में चलते-चलते बच्चपन के ‘पौधा चौर विष्णु’ लाम्बा को आज नाम मिला है ‘ट्री मेंन ऑफ़ इंडिया’….. अत्यंत सादगी और विनम्रता के धनी विष्णु लाम्बा बढ़ते पर्यावरण संकट के लिए ना केवल चिन्तित हैं बल्कि निरन्तर एवं सतत् प्रयत्नशील है । उन्होंने आजीवन पर्यावरण की सेवा का संकल्प ही नहीं लिया बल्कि बखूबी निभा भी रहे है ! अपने 29 वर्ष के जीवन में 21 वर्ष प्रकृति को परमात्मा मानकर उसकी हिपाजत में जुटे लाम्बा के अथक प्रयासों से आज समाज में पर्यावरण संरक्षण को लेकर एक नई क्रान्ति का सूत्रपात हुआ है ! खाशक़र युवाओं में बढ़ती लोकप्रियता ने आज लाम्बा को प्रकृति प्रेमियों की इतनी बड़ी टीम दी है, जिसे आसानी से तैयार करना बहुत मुश्किल था ! लाखों युवाओं के आदर्श बनें लाम्बा को पूर्ण विश्वास है की वो दिन दूर नहीं जब हर आम और खाश उनकी मुहीम का हिस्सा बनेगे और वो अपना मिशन पूर्ण करते हुए विश्व के सामने पर्यावरण जगत का श्रेष्ठ उदाहरण रखेंगे !

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